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रचनात्मक व्यक्ति विचारों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें आमंत्रित करता है। प्रो. के. एल. तलवाड़।

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डोईवाला (राजेंद्र वर्मा):
बिना विचारों के न तो नवाचार संभव है और न ही प्रगति। जितने अधिक विचार जन्म लेते हैं, उतनी ही अधिक संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। यह कथन साईं सृजन पटल के संस्थापक प्रो. (डॉ.) के. एल. तलवाड़ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पूरी तरह सटीक बैठता है।

सेवानिवृत्ति के बाद भी प्रो. तलवाड़ सृजन और नवाचार की निरंतर साधना में जुटे हुए हैं। उन्होंने साईं सृजन पटल की स्थापना कर रचनात्मक अभिव्यक्ति को एक सशक्त मंच प्रदान किया है। विशेष बात यह है कि वे नित नए-नए प्रयोगों के माध्यम से नवाचार को नया आयाम दे रहे हैं।

प्रो. तलवाड़ ने पुराने टेबल कैलेंडर का रचनात्मक पुनः उपयोग करते हुए उसे एक नया जीवन दिया है। उन्होंने साईं सृजन पटल की मासिक पत्रिका के विमोचन कार्यक्रम तथा पटल के प्रथम स्थापना दिवस की स्मृतियों को पुराने टेबल कैलेंडर के माध्यम से कलात्मक रूप में संजोया है। यह पहल न केवल उनकी रचनात्मक सोच को दर्शाती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और पुनः उपयोग की भावना को भी सशक्त रूप से सामने लाती है।

प्रो. तलवाड़ का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तव में नई खोजें करनी हैं, तो उसे अच्छे विचारों की प्रतीक्षा करने के बजाय अधिक से अधिक विचार उत्पन्न करने चाहिए। महान खोज किसी एक चमकदार विचार से नहीं, बल्कि असंख्य छोटे-बड़े विचारों की भीड़ से जन्म लेती है। रचनात्मक व्यक्ति विचारों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें आमंत्रित करता है।

वे कहते हैं कि केवल अच्छे विचारों की प्रतीक्षा करने से कुछ नहीं होता, बल्कि निरंतर विचार सृजन ही अच्छे विचार तक पहुँचने का सबसे प्रभावी मार्ग है।

प्रो. तलवाड़ के शिष्य और साईं सृजन पटल से जुड़े अंकित तिवारी बताते हैं कि उनके गुरु सदैव सार्थक और सकारात्मक विचारों पर ही अपनी ऊर्जा और समय केंद्रित करते हैं। उनसे यह सीख मिली है कि नए-नए विचारों को आजमाने से कभी भयभीत नहीं होना चाहिए, क्योंकि हर विचार अगले बेहतर विचार की नींव बन सकता है।

अंकित तिवारी के अनुसार, रचनात्मकता केवल कल्पना नहीं और सफलता केवल मेहनत नहीं है। इन दोनों को जोड़ने वाला सेतु विवेक है, जिसे मजबूत बनाकर ही व्यक्ति सही और गलत के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।

प्रो. के. एल. तलवाड़ की यह रचनात्मक पहल न केवल युवाओं को नवाचार के लिए प्रेरित करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सीमित संसाधनों में भी सृजन की असीम संभावनाएँ मौजूद हैं।

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