श्री राम के वनवास प्रसंग ने बांधा समां, कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय ने जीता दर्शकों का दिल।
कैकयी–मंथरा संवाद की सशक्त प्रस्तुति, अयोध्या के द्वंद्व को जीवंत किया मंचन।
डोईवाला श्री आदर्श रामलीला समिति बड़ासी ग्रांट द्वारा आयोजित रामलीला महोत्सव के तीसरे दिन का मंचन भावनात्मक दृश्यों और सशक्त संवादों से भरपूर रहा। इस बार प्रस्तुति का मुख्य केंद्र केवल श्री राम को 14 वर्ष का वनवास मिलने का क्षण नहीं, बल्कि अयोध्या में उस निर्णय से उपजे मानसिक, पारिवारिक और राजसी संघर्ष को दर्शाना रहा, जिसने पूरा वातावरण गंभीर बना दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि शिक्षक जगदीश सिंह और कवि डॉ. सुशील कोटनाला द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ।
जगदीश सिंह ने कहा कि रामलीला समाज में मर्यादा, आदर्श और संस्कारों की शिक्षा देने वाला शक्तिशाली माध्यम है।
वहीं डॉ. सुशील कोटनाला ने कहा कि समिति का अनुशासित और भावनापूर्ण मंचन बच्चों और युवाओं के लिए प्रेरणादायक दिशा प्रदान करता है।
मंचन की शुरुआत मंथरा–कैकयी संवाद से हुई, जहां मंथरा के षड्यंत्र, कैकयी के मन में उठते द्वंद्व और अंततः निर्णय लेने की विवशता को कलाकारों ने इतने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया कि दर्शकों ने पूरे ध्यान से दृश्य को आत्मसात किया। कैकयी द्वारा महाराज दशरथ से राम को वनवास और भरत को राज्य देने की मांग का प्रसंग मंच पर आते ही पंडाल में गहरा सन्नाटा पसर गया।
इसके बाद महाराज दशरथ की व्याकुलता, पुत्र-वियोग का दर्द और श्री राम का पिता के वचनों की मर्यादा रखते हुए शांत मन से 14 वर्ष का वनवास स्वीकार करने का दृश्य पूरे कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण रहा। दर्शकों में बैठे अनेक लोगों की आंखें नम हो गईं।
माता सीता और लक्ष्मण का राम के साथ वन जाने का दृढ़ संकल्प भी मंच पर अत्यंत प्रभावी तरीके से उभरा, जिसने कार्यक्रम की भावनात्मक गहराई को और बढ़ा दिया।
समिति अध्यक्ष दिनेश चुनारा, रघुवीर चुनारा, उषा सोलंकी, नरेंद्र सोलंकी, अशोक थापा, संजय कपूर, सुशील पाल, नीरज रावत, रेनू चुनारा आदि के अलावा श्रद्धालु मौजूद रहे।



