खतरे को आदत में बदल रहे लोग: जंगल किनारे मॉर्निंग वॉक मानो रोमांच का नया ‘ट्रेंड’।
सुरक्षा चेतावनियाँ नाकाम, वन विभाग लोगों की मानसिकता बदलने में जूझ रहा।
डोईवाला (राजेंद्र वर्मा):
जंगलों के पास बढ़ते हाथियों के खतरे पर वन विभाग जितना चिंतित है, उतना ही बेपरवाह आम लोग दिख रहे हैं। मॉर्निंग वॉक अब मानो स्वास्थ्य नहीं, बल्कि रोमांच की तरह लिया जा रहा है। चेतावनियों के बावजूद लोग जोखिम भरे मार्गों को छोड़ने को तैयार ही नहीं—जैसे खतरा नहीं, बल्कि आकर्षण हो।
हाथियों की आवाजाही में हाल के दिनों में हुई तेजी ने वन विभाग को अलर्ट मोड पर ला दिया है। लेकिन स्थानीय लोगों में इसकी गंभीरता पर उतना असर नहीं दिखा, जितनी उम्मीद थी। बुजुर्ग हों या युवा—हर वर्ग के लोग सुबह-सवेरे उसी पथ पर निकल पड़ते हैं, जिसे विभाग असुरक्षित घोषित कर चुका है।
वन क्षेत्राधिकारी मेधावी कीर्ति का कहना है कि “लोग सुरक्षा को लेकर जागरूक कम और जिद्दी ज्यादा लगते हैं। जोखिम भरे मार्गों से बचने की अपील बार-बार की गई है, लेकिन लोग इसे अपनी दिनचर्या से जोड़कर छोड़ना नहीं चाहते। यह लापरवाही किसी भी वक्त बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है।”
विभाग गश्त बढ़ा रहा है, घोषणाएँ कर रहा है, वैकल्पिक रास्तों का सुझाव दे रहा है—लेकिन असली समस्या लोगों का यह मान लेना है कि खतरा ‘दूसरों’ के लिए है, उनके लिए नहीं। इसी सोच के कारण हाथियों के साथ होने वाली घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
जानकारों का कहना है कि खतरा केवल हाथियों से नहीं, बल्कि उस सोच से है जो चेतावनियों को केवल औपचारिकता मानती है। यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो विभाग के प्रयासों का असर सीमित रह जाएगा और दुर्घटनाओं की आशंका और बढ़ जाएगी।
लोगों से अपील है कि मॉर्निंग वॉक को रोमांच नहीं, सुरक्षा के दायरे में रखें। सुरक्षित मार्ग चुनें, समूह में चलें और विभाग की चेतावनियों को अनसुना न करें—क्योंकि जान जोखिम में डालकर की गई सैर कभी स्वास्थ्य का साधन नहीं बन सकती।



