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दो साल बाद गन्ने का रेट बढ़ा, किसानों में मिली-जुली प्रतिक्रिया।

बढ़ती लागत का हवाला देकर किसान संगठनों ने ₹450 क्विंटल एमएसपी की मांग उठाई, कुछ किसानों ने फैसले को बताया राहत की शुरुआत।

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डोईवाला (राजेंद्र वर्मा):
राज्य सरकार ने इस वर्ष गन्ने के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में ₹30 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। दो साल बाद हुई इस बढ़ोतरी पर किसानों में मिली–जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। एक ओर कुछ किसान इसे राहत भरा कदम बता रहे हैं, वहीं अधिकतर किसान इसे महंगाई के मुकाबले बेहद कम मान रहे हैं।
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किसानों का कहना है कि पिछले दो वर्षों में खाद, डीज़ल, कीटनाशक, बीज, मजदूरी और मशीनरी की लागत तेज़ी से बढ़ी है। ऐसे में ₹30 की बढ़ोतरी उनकी बढ़ी हुई लागत की भरपाई नहीं कर पाती। किसान संगठन सरकार से गन्ने का एमएसपी कम से कम ₹450 प्रति क्विंटल करने की मांग कर रहे हैं।
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सरकार ने किसानों की मांग पर बढ़ोतरी की है। इससे अगली फसल की तैयारी को हौसला मिलेगा। उम्मीद है सरकार आगे भी किसान हित में सकारात्मक पहल जारी रखेगी।
रूपचंद कुड़कावला

सरकार का निर्णय किसान समुदाय में भरोसा बढ़ाने वाला है। यदि और थोड़ी वृद्धि हो जाती तो किसानों के हित में होती I मिलों से भुगतान समय पर मिल गया तो यह बढ़ोतरी और असरदार साबित होगी।
रनजोत सिंह बुल्लावाला

दो साल बाद सिर्फ ₹30 बढ़ोतरी किसानों के साथ अन्याय है।
खेती की दवाइयाँ, डीज़ल, खाद, मजदूरी और कीटनाशक तक दोगुने दाम पर मिल रहे हैं, ऐसे में यह बढ़ोतरी दिखती भी नहीं।
सरकार एमएसपी ₹450 प्रति क्विंटल करे, तभी किसानों को राहत मिलेगी।
सुरेंद्र खालसा जिलाध्यक्ष भाकियु( टिकैत)

यह कागज़ी बढ़ोतरी है।
खेती की दवाइयाँ, कीटनाशक, बीज, मशीनरी और मजदूरी इतनी महंगी हो चुकी है कि ₹30 की बढ़ोतरी किसी काम की नहीं।
सरकार को किसानों की वास्तविक लागत को समझना होगा।
कमल अरोड़ा डोईवाला

गन्ने के रेट बढ़ने के बाद किसानों में दो धाराएँ बन गई हैं—एक वर्ग राहत महसूस कर रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे लागत के मुकाबले अपर्याप्त बता रहा है। गांवों और किसान बैठकों में इस समय यही चर्चा है कि यह बढ़ोतरी बढ़ती लागत को कितना कवर कर पाएगी।

कुल मिलाकर, गन्ने के एमएसपी पर हुआ यह बदलाव किसानों में नई बहस छेड़ रहा है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर चर्चा और तेज़ होने की संभावना है।

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