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भक्ति और सांस्कृतिक धरोहर की अभिव्यक्ति: सुरकण्डा मंदिर में बद्रीश पिछौड़ी की भेंट।

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डोईवाला रानीपोखरी (राजेंद्र वर्मा):
सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का महत्व समय-समय पर हमें यह याद दिलाता है कि हमारे धार्मिक अनुष्ठान केवल भक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें हमारे प्राचीन संस्कारों और धरोहरों का संरक्षण भी छिपा हुआ है। हाल ही में डोईवाला कॉलेज के पूर्व विश्वविद्यालय प्रतिनिधि, अंकित तिवारी द्वारा सुरकण्डा माता मंदिर में भेंट की गई बद्रीश पिछौड़ी इस बात का सशक्त उदाहरण बनी है।

कुछ दिन पूर्व, पिछौड़ी वूमेन मंजू टम्टा ने अंकित तिवारी को एक विशेष पिछौड़ी भेंट की थी, जिसे उन्होंने माता सुरकण्डा के चरणों में अर्पित किया। इस पिछौड़ी की खास बात यह है कि इसमें पहली बार ज़री बॉर्डर के साथ भगवान बद्रीनाथ के वस्त्र का एक छोटा अंश भी इस्तेमाल किया गया है। यह वस्त्र भगवान बद्रीनाथ का प्रसाद माना जाता है, और इसे विशेष रूप से श्रद्धा और आस्था के साथ तैयार किया गया था। इस पहल से यह न केवल धार्मिक भावनाओं का सम्मान करती है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजने का एक अनूठा प्रयास है।

मंजू टम्टा के अनुसार, इस पिछौड़ी को बनाते हुए उन्हें सुखद और आत्मिक अनुभूति हुई, और वे आशा करती हैं कि इसे पहनने वाले लोग भी भगवान बद्रीनाथ का आशीर्वाद महसूस करेंगे। यह एक मान्यता है कि जहां भी भगवान के प्रसाद का अंश होता है, वहां आशीर्वाद और शांति का वास होता है। इस विशेष पिछौड़ी के माध्यम से न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि लोक कला और हस्तशिल्प की महत्ता भी उभर कर सामने आई है।

इस अवसर पर मंदिर के पुजारी रामप्रकाश तिवारी, भक्त बीना तिवारी, डॉ. मनमोहन कुकरेती और भारती तिवारी कुकरेती उपस्थित थे, जिन्होंने इस भव्य धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार के आयोजनों से न केवल धार्मिक आस्थाओं को बल मिलता है, बल्कि समाज में एकता और समरसता की भावना भी जागृत होती है।

यह आयोजन हम सभी को यह सिखाता है कि धर्म और संस्कृति के संरक्षण में न केवल मंदिरों और पूजा स्थलों का योगदान होता है, बल्कि समाज के हर वर्ग का सहयोग भी आवश्यक है। बद्रीश पिछौड़ी की भेंट केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आस्था का एक अद्भुत प्रतीक है, जो हमें अपने इतिहास और परंपराओं से जोड़ता है।

सुरकण्डा मंदिर में भेंट की गई इस पिछौड़ी ने हमें यह याद दिलाया कि हमारी धार्मिक आस्थाएं और सांस्कृतिक धरोहर एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़ी हुई हैं। यह न केवल एक श्रद्धा का कार्य है, बल्कि एक संदेश है कि हम अपनी परंपराओं को सम्मानित करें और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास करें।

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