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हिम्स जौलीग्रांट का आईसीएमआर की राष्ट्रीय संक्रमण नियंत्रण परियोजना में चयन। (देशभर के 16 चयनित संस्थानों में क्षेत्रीय केंद्र के रूप में मिली महत्वपूर्ण जिम्मेदारी)

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डोईवाला (राजेंद्र वर्मा):
हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (हिम्स), जौलीग्रांट को अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा से जुड़े संक्रमणों की रोकथाम, निगरानी और प्रबंधन को मजबूत करने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की राष्ट्रीय परियोजना के लिए चुना गया है। देशभर के 16 चयनित संस्थानों में हिम्स को क्षेत्रीय केंद्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।

हिम्स जौलीग्रांट की अस्पताल संक्रमण नियंत्रण समिति की अध्यक्ष डॉ. गरिमा मित्तल ने बताया कि यह चयन संक्रमण की रोकथाम एवं नियंत्रण के क्षेत्र में संस्थान की विशेषज्ञता और मजबूत व्यवस्थाओं की राष्ट्रीय पहचान है। हिमालयन अस्पताल की संक्रमण नियंत्रण समिति मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए लगातार इस दिशा में कार्य कर रही है।

डॉ. गरिमा मित्तल ने बताया कि आईसीएमआर की इस परियोजना का उद्देश्य माध्यमिक एवं तृतीयक स्तर के अस्पतालों में संक्रमण के प्रकोप से निपटने की क्षमता को मजबूत करना है। यह परियोजना प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-एबीएचआईएम) के तहत ‘हब एंड स्पोक’ मॉडल पर संचालित होगी।

क्षेत्रीय केंद्र के रूप में हिम्स जौलीग्रांट जिला अस्पतालों, निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और अन्य पात्र स्वास्थ्य संस्थानों को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ेगा। इन संस्थानों को संक्रमण की रोकथाम, निगरानी, संक्रमण के प्रकोप की जांच, प्रयोगशाला जांच तथा रोगाणुरोधी दवाओं के उचित उपयोग के संबंध में प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग दिया जाएगा।

राष्ट्रीय स्तर पर इस कार्यक्रम के तहत 500 स्वास्थ्य संस्थानों, जिनमें 100 जिला अस्पताल और 400 निजी क्षेत्र के अस्पताल शामिल हैं, की संक्रमण नियंत्रण क्षमता मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है।

परियोजना का नेतृत्व डॉ. गरिमा मित्तल कर रही हैं। डॉ. हेम चंद्र पांडे, डॉ. सोएब अहमद, डॉ. राजेंद्र सिंह, डॉ. अर्पणा सिंह, डॉ. निक्कू यादव, डॉ. नेहा शर्मा, डॉ. दिव्या अंथवाल और श्वेता सामंत सह-अन्वेषक के रूप में परियोजना से जुड़े हैं। वहीं डॉ. ए.के. देवरारी, डॉ. बिंदु डे और डॉ. किरण काटोच परियोजना में मार्गदर्शन देंगे।

दो वर्षों की इस परियोजना से अस्पतालों में संक्रमण की समय पर पहचान और रोकथाम, संक्रमण के प्रकोप की जांच, रोगाणुरोधी दवाओं के उचित उपयोग तथा महामारी से निपटने की तैयारियों को मजबूती मिलेगी। इससे स्वास्थ्य संस्थानों की क्षमता बढ़ेगी और मरीजों की सुरक्षा के साथ देश की समग्र महामारी तैयारियों को भी बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

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